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बदांयू 25 अगस्त।
सब्जियों के राजा को इस बार बाजार में भाव नहीं मिल रहा है। दाम नहीं बढ़ने से आलू की शीतगृहों से निकासी नहीं हो रही है। जिले में पिछले चार माह में 30 से 40 प्रतिशत आलू की निकासी शीतगृहों से हो पाई है। करीब 50 से 60 प्रतिशत आलू शीतगृहों में जमा है, जिसकी अगले दो माह में निकासी होनी है। हालात नहीं सुधरे तो आलू की बेकद्री हो सकती है और सड़कों पर फेंकने जैसी नौबत आ सकती है।
उद्यान विभाग भी किसानों को आलू निकालने के लिए चेता रहा है। किसान परेशान है कि इस बार भाड़ा निकल भी पाएगा या नहीं। कोल्डस्टोरेज स्वामी बताते हैं कि इस बार जिले में आलू का रक्बा करीब हजार हेक्टेयर बढ़ा था और पैदावार भी 15 प्रतिशत अधिक हुई। उन्होंने बताया कि इसमें से 30 प्रतिशत की ही निकासी हो पाई है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी बंगाल, मध्यप्रदेश में भी आलू की अच्छी पैदावार हुई है। फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज को भी पर्याप्त माल मिला है। बाजार में मांग कम हुई है।
शीतगृह मालिकों की माने तो पिछले दो साल से भाव भी अच्छा मिल रहा था। मार्च 2025 तक आलू का भंडारण हुआ और मई से निकासी शुरू हो गई। मई माह से अगस्त माह तक करीब 35 से 40 फीसदी ही आलू की निकासी हो पाई है। पिछले साल में इस समय तक 50 फीसदी आलू की निकासी हो जाती थी।
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आलू की स्थिति इस बार चिंताजनक है। बाजार की स्थिति को देखते हुए 10 से 20 फीसदी आलू शीतगृहों में रह सकता है। 31 अक्तूबर तक आलू की निकासी का समय होता है।
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इस बार बहुत कम निकासी हुई है। हरी सब्जियों की अच्छी पैदावार और हाइब्रिड आलू की वजह से भी किसानों को फसल का अच्छा रेट नहीं मिल पा रहा है। नवीन कुमार कोल्डस्टोरेज संचालक।
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सामान्य आलू का अच्छा रेट नहीं मिल पा रहा है। आलू की शीतगृहों से बिक्री नहीं हो पा रही है। अगर समय रहते आलू की निकासी न हुई तो भारी नुकसान होने की संभावना है।- रवि कुमार कोल्डस्टोरेज संचालक।
व्यापारियों और किसानों के अनुसार इस समय शीतगृहों से 3797 प्रजाति का आलू 600 से 700 प्रति पैकेट (50किलोग्राम) तक बिक रहा है, जबकि पिछले साल यह 1200 से 1300 रुपये प्रति पैकेट बिका था। हाइब्रिड आलू इस बार 400 से 550 तक बिक रहा है, जबकि पिछले साल यही आलू 1000 से 1100 रुपये प्रति पैकेट तक बिक गया था।
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किसानों का कहना है कि मौजूदा भाव में किसानों को घाटा हो रहा है। इसलिए शीतगृह से नहीं निकाल रहे। अगस्त माह में भाव बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। किसान दीपू चौधरी बताते हैं कि एक बीघा खेत में 50 से 60 पैकेट आलू हुआ। इसमें करीब 25 हजार रुपये की लागत आई। कोल्ड स्टोरेज भाड़ा, बारदाना और प्रति पैकेट शीतगृह तक पहुंचाने के भाडे में 200 रपये खर्च हो गए। भाव कम मिलने से प्रति पैकेट घाटा है।
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कारोबारियों के अनुसार उत्तर प्रदेश के आलू का बाजार सिकुड़ रहा है। पंजाब, गुजरात और पश्चिमी बंगाल के आलू ने यूपी के आलू की खपत कम कर दी है। पहले यहां से छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, राजस्थान और हरियाणा में आलू जाता था, लेकिन अब वहां पंजाब का आलू छाया हुआ है। बंगाल ने भी अपना आलू भेजना शुरू कर दिया है। गुजरात में भी अपनी आलू की फसल होने लगी है। इन कारणों से यूपी के आलू की मांग कम हुई है।
प्रदीप प्रजापति
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