बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
हमारी सुरक्षा में तैनात वर्दीधारी देखने में बहुत अच्छे लगते हैं और लोगों को यही लगता है कि वर्दी का जलवा अलग ही होता है लेकिन बहुत कम लोग हैं जो इस वर्दी को पहनने वाले इंसान का दर्द समझते होगें। आज इस थाने और कल उस थाने की स्थानांतरण प्रकिया वर्दीधारियों की ऐसी परेशानी ह ैजिससे अधिकांश वदीधारियों का सेवा के दौरान कई बार सामना करना पडता है जबकि सरकारी आवास का आवेदन लेकर इधर से उधर घूमना वर्दीधारियों के जीवन में हर समय दर्द देने का काम करती है। वर्दी वालों को लोग किराये पर मकान देना पसंद नहीं करते और सरकारी आवास वर्दीधारियों को तब मिल पाता है जब कोई आवास खाली हो और उन पर अफसर की निगाह सीधी हो। वर्दी का रौब तो सबको दिखता है लेकिन परिवार से दूर होने के साथ वर्दीधारियों का ना तो डयूटी का समय निश्चित हो पाता है और ना ही परिवार के साथ कोई त्योहार मनाने का मौका किसी बिरले को ही मिल पाता है और तो और बेटे और बेटी के रिश्ता ढूंढने के लिए जितनी मेहनता वर्दीधारियों को करना पडती है वह हर कोई महसूस नहीं कर पाता और तो और बेटे – बेटी का रिश्ता ढूंढने से ज्यादा मशक्कत वर्दीधारियों को इस काम के लिए छुटटी लेने में करनी पडती है यह बात भी कटु सत्य है। इन तमाम बातों के अलावा वर्दीधारियों को एक दर्द अक्सर सहना पडता है और वह अवसर जब सामने आता है जब अपनी गलती ना होते हुए अधिकारी के बचाव हेतु क्या – क्या दर्द सहने पडते हैं जिसके कारण वर्दीधारी की हालत आगे बढ और पीछे हट की हालत में फंसी नजर आने लगती है।
वर्दी पहनकर डयूटी करने वाले होमगार्ड और पीआरडी के जवानों के साथ गांव में चौकीदारी का दायित्व निभाने वाले इंसानों का दर्द तो और गहरा प्रतीत होता है उस पर फिर कभी विस्तार से आपके सम्मुख लाने का प्रयास करूंगा। आज तो वर्दी पहनकर हमारी सुरक्षा में तैनात वर्दीधारियों का वह दर्द आपके सम्मुख रखा है जिसको मैने काफी करीब से देखा है।













bdnindia.com bdnindia.com | www.bdnindia.com



