*।****************************** उझानी बदांयू 7 फरवरी।
एंटीबायोटिक दवाइयों के अधिक इस्तेमाल से बीमारी के वक्त जांच में मरीजों में क्लासिकल लक्षण (बीमारी की स्थिति और उसके प्रमुख लक्षण) नहीं मिल रहे हैं। इसी की एक वजह शरीर में गुड बैक्टीरिया का कम होना भी है। निजी अस्पतालों की ओपीडी में पहुंचने वाले मरीजों में 50 फीसदी इस तरह की समस्या से पीड़ित मिल रहे हैं। इन लोगों के प्राथमिक पर इलाज में प्रोटोकाल का अनुपालन नहीं हुआ और जांच के बगैर एंटीबायोटिक का ज्यादा इस्तेमाल किया गया।
डॉ. इबा फरमान ने बताया कि हर दिन लगभग 20 से 25 मरीज आते हैं। इनमें से करीब 50 फीसदी मरीज ऐसे होते हैं, जो लंबे समय से एंटीबायोटिक दवाइयों का इस्तेमाल करते हुए आ रहे हैं। ऐसे मरीजों की जांच के दौरान उनकी समस्या के क्लासिकल लक्षण नहीं मिलते हैं। कल्चर जांच में भी बीमारी पकड़ में नहीं आती हैं। इनमें सबसे अधिक दिक्कत खून और पेशाब में संक्रमण वाले मरीजों को हो रही है। ऐसी स्थिति में इलाज में दिक्कत भी आ रही है। साथ ही जांच कराने में समय लग रहा है। एंटीबायोटिक का असर शरीर में खत्म होने के बाद कल्चर सहित अन्य ब्लड जांच कराई जा रही है।
एंटीबायोटिक ने बढ़ा दिए बैड बैक्टीरिया
सिटी हाॅस्पीटल के पेट रोग चिकित्सक डॉ. इबा फरमान के अनुसार ओपीडी में आने वाले मरीजों की बीमारियों के इतिहास से पता चल रहा है कि हल्का बुखार या फिर सर्दी-जुकाम होने पर मरीज मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक दवाइयां लेकर सेवन कर लेते हैं। एंटीबायोटिक बड़ी संख्या में अच्छे बैक्टीरिया को भी मार देता है। वहीं इसके सेवन से वायरस कभी नहीं मरते हैं। जांच में पता चला है कि जिन लोगों ने एंटीबायोटिक का इस्तेमाल अधिक किया, उनके शरीर में अच्छे बैक्टीरिया नहीं मिल रहे और शत्रु बैक्टीरिया बढ़े हुए पा जा रहे हैं।—————-******* राजेश वार्ष्णेय एमके।

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