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साहित्यकारों की नगरी में पुस्तकालय नहीं, उपेक्षित है कुंवरगांव की साहित्यिक विरासत

साहित्यकारों की नगरी में पुस्तकालय नहीं, उपेक्षित है कुंवरगांव की साहित्यिक विरासत

कुंवर गांव संवाददाता

कुंवरगांव। बदायूं की धरती ने अनेक साहित्यकारों, लेखकों और कवियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से बदायूं का नाम देश-विदेश में रोशन किया। साहित्य की इस परंपरा से कुंवरगांव भी अछूता नहीं रहा। यहां के साहित्यकारों और कवियों ने भी अपनी रचनाओं से पूरे देश में कुंवरगांव की पहचान बनाई।इसके बावजूद विडंबना यह है कि इन साहित्यकारों की विरासत को सहेजने के लिए नगर में आज तक एक पुस्तकालय तक नहीं है।

कुंवरगांव के साहित्यिक इतिहास में कवि मुंशी कल्याण राय तथा बिजेंद्र नाथ मिश्र ‘निर्गुण’ का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। बिजेंद्र नाथ मिश्र ‘निर्गुण’ की पुस्तकें विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल रही हैं। उनकी कहानियों पर दूरदर्शन पर धारावाहिक भी प्रसारित हो चुका
। वहीं मुंशी कल्याण राय की कालजयी रचना ‘कल्याण तरंग’ लोक साहित्य और आल्हा गायन की परंपरा में अपनी अलग पहचान रखती है।
मुंशी कल्याण राय को ग्रामीण अंचलों में आज भी विशेष सम्मान के साथ याद किया जाता है। जनपद के लोग ‘कल्याण तरंग’ को तो जानते हैं, लेकिन बहुत से लोगों को यह जानकारी नहीं है कि इसके रचयिता का संबंध कुंवरगांव से रहा है। मुंशी कल्याण राय कायस्थ परिवार से ताल्लुक रखते थे और हेडमास्टर भी रहे। उनकी रचना ‘कल्याण तरंग’ आल्हा की भाषा और शैली में लिखी गई पुस्तकों का संग्रह है, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से पसंद किया जाता है।
ग्रामीण चौपालों पर जब लोग एकत्र होते हैं तो गायकी के शौकीन लोग ‘कल्याण तरंग’ की धुन छेड़ देते हैं और सुनने वाले उसी में मगन हो जाते हैं। इसे सुनाने के लिए बाहर से गायकी की कंपनियां और मंडलियां भी आती रही हैं। हालांकि टीवी और सैटेलाइट चैनलों के दौर में लोकगायन के प्रति लोगों की रुचि कुछ कम हुई है, लेकिन शाहजहांपुर, संभल, हाथरस, अलीगढ़, गोला, गोकरन, खीरी सहित कई जिलों और बिहार में आज भी ‘कल्याण तरंग’ के शौकीनों की कमी नहीं है।

कल्याण राय की रचनाओं की समृद्ध परंपरा

मुंशी कल्याण राय के बेटे शांति स्वरूप के बेटे वीरेंद्र कुमार सक्सेना बदायूं डिपो में कार्यरत थे, जिनका कुछ समय पूर्व निधन हो चुका है। उनके दो बेटे अमित कुमार सक्सेना और सुमित कुमार सक्सेना अपने पुश्तैनी मकान में रह रहे हैं। त्रिपौलिया पर स्थित उनके मकान का वर्तमान में जीर्णोद्धार कराया जा रहा है।

बताया जाता है कि ‘कल्याण तरंग’ के अंतर्गत ‘ब्रह्मा का व्याह’ दो भाग, ‘असली बेला का गौना’ दो भाग, ‘जैत खंव संग्राम’ और ‘विश्वव्यापी महाकाल युद्ध’ सहित विभिन्न प्रसंग शामिल हैं।

‘सरसा समर’ का पांचवां और अंतिम भाग ‘काल रूप संग्राम’ के रूप में वर्णित है। इसमें वीर मलिखान के घनघोर संग्राम से पृथ्वीराज के बेहद परेशान होने, मलिखान को जीतना असंभव समझने और फिर माहिल की सम्मति लेकर धोखे से मलिखान को मिलने के लिए बुलाने तथा आभी में गिराने का वर्णन मिलता है। अतिवीर के गिरते-गिरते दिल्ली के अनेक सूरमाओं को मौत के घाट उतारने और स्वयं प्राण त्यागने का भी वर्णन है।

रचना में कहा गया है—

“क्रोध अग्नि हृदय में दहको बन गया ज्ञान बदल संताय।
पकड़ि लिए सब उदयराज ने जिम गतिमार अश्व पैधाय।”

वहीं ‘आल्हा मनौआ’ के दूसरे भाग में उदयराज के सिरसा आने की खबर मिलने पर शब्दभेद के दल में मची खलबली, चंदराय के समझाने तथा माहिल के परिमाल के दरबार में चिट्ठी लेकर जाने का वर्णन मिलता है।

‘आल्हा मनौआ’ के चौथे भाग में जगनायक के रजगिर पहुंचने तथा मंडरीक और उदयराज आदि बनाफलों के लाखन के साथ महोबे रवाना होने का वर्णन है। नदी बितवा पर शब्दभेद के दल से भयानक युद्ध के बाद बनाफलों के लाखन के साथ महोबे पहुंचने का प्रसंग भी इसमें मिलता है।

इसी भाग में लिखा है—

“शीश काट सिरसे पहुंचाया भट गढ़द्वार देहिं गड़वाय।
लाशा शिवर लध्य भिजवा दी छाती मध्य शक्ति भिदवाय।।“

लोकगायकों और ग्रामीणों के बीच ‘कल्याण तरंग’ का प्रभाव ऐसा बताया जाता है कि इसे पढ़ने अथवा सुनने से भुजाएं फड़कने और खून खौलने जैसा जोश पैदा हो जाता है।

न मूर्ति, न स्मारक, न पुस्तकालय

इतनी समृद्ध साहित्यिक विरासत होने के बावजूद कुंवरगांव में मुंशी कल्याण राय की न तो कोई प्रतिमा है, न कोई स्मृति स्थल, पहचान चिह्न और न ही पुस्तकालय। साहित्य प्रेमियों का कहना है कि जिस नगर ने ऐसे साहित्यकारों को जन्म दिया, वहां उनकी रचनाओं और साहित्यिक योगदान को संरक्षित करने के लिए पुस्तकालय अथवा स्मारक होना चाहिए।

मुंशी कल्याण राय का कुंवरगांव से गहरा और सीधा संबंध माना जाता है। क्षेत्रीय लोक मान्यताओं, आल्हा-ढोला गायकों की मौखिक परंपराओं और बुंदेलखंड-रुहेलखंड के कुछ स्थानीय इतिहासों में भी उनका संबंध कुंवरगांव से जोड़ा जाता है। हालांकि अलीगढ़-हाथरस क्षेत्र से उनके जुड़ाव को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं, लेकिन ‘कल्याण तरंग’ के रचयिता के रूप में कुंवरगांव में उनकी साहित्यिक पहचान आज भी मजबूत है।

आल्हा के देहाती अखाड़ों और स्थानीय गायकों की मंडलियों में आज भी मुंशी कल्याण राय को कुंवरगांव के गौरव के रूप में याद किया जाता है। ऐसे में साहित्य प्रेमियों की मांग है कि नगर में उनके नाम पर पुस्तकालय, स्मृति स्थल या साहित्यिक संग्रहालय स्थापित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां कुंवरगांव की इस गौरवशाली साहित्यिक विरासत से परिचित हो सकें।

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