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गंगा की कटान से उजड़ रहे गांव, दर्जनों मकान समाए नदी में; सैकड़ों बीघा जमीन भी गंगा में विलीन

बदायूं

गंगा की कटान से उजड़ रहे गांव, दर्जनों मकान समाए नदी में; सैकड़ों बीघा जमीन भी गंगा में विलीन

केशव गुप्ता

उसहैत/बदायूं। बदायूं जिले के उसहैत क्षेत्र में गंगा नदी का जलस्तर कुछ घटने के बावजूद कटान का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कदम नगला गांव में गंगा की तेज धारा और लगातार हो रहे भू-कटान से दर्जनों मकान नदी में समा चुके हैं। हालात ऐसे हैं कि कई ग्रामीण अपने आशियाने खुद तोड़कर ईंट, सरिया और अन्य निर्माण सामग्री सुरक्षित निकालने में जुटे हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक, कटान के चलते कई परिवार पहले ही गांव छोड़कर जा चुके हैं, जबकि कुछ परिवार सड़क किनारे अस्थायी तंबू लगाकर रहने को मजबूर हैं। प्रशासन की ओर से प्रभावित लोगों को राशन उपलब्ध कराया गया है। कदम नगला में जिन ग्रामीणों के मकान कटान की चपेट में आए हैं, उन्हें मुआवजा राशि भी दी जा रही है। सात परिवार अभी भी तंबुओं में जीवन गुजार रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि गंगा की धारा में घुमाव के कारण कटान की रफ्तार बढ़ी है। इससे खेती की जमीन भी लगातार नदी में समाती जा रही है। वहीं, भुंडी गांव में भी कई दिनों से कटान जारी है। करीब 250 बीघा खेत गंगा में समा चुके हैं, जबकि दर्जनों किसानों की सैकड़ों बीघा कृषि भूमि फसल समेत नदी में विलीन हो चुकी है। ग्रामीण मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं और तटबंध पर भी खतरा मंडरा रहा है।
कटान प्रभावित गांवों में मच्छरों और अन्य कीटों का प्रकोप भी ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा रहा है। सड़क किनारे चूल्हा जलाकर भोजन बनाने और पशुओं को खुले में बांधकर रखने की मजबूरी बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी सीमित है और प्रशासन से और अधिक राहत की मांग की जा रही है।

स्थिति का जायजा लेने के लिए दातागंज के उपजिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी (एडीएम) और बाढ़ खंड के अधिकारियों ने भुंडी व कदम नगला गांव का दौरा किया। प्रशासन, राजस्व विभाग और बाढ़ खंड की टीम लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। एसडीएम विनोद कुमार के अनुसार पानी का स्तर कम हुआ है और समस्या मुख्य रूप से कदम नगला में है। प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है तथा शेष लोगों को भी जल्द मदद देने की बात कही गई है।
गंगा का कटान अब ग्रामीणों के लिए सिर्फ खेत और जमीन का नुकसान नहीं, बल्कि उनके आशियानों और रोजी-रोटी पर भी सीधा संकट बन गया है। ग्रामीणों की नजर अब प्रशासन की राहत और मुआवजा व्यवस्था पर टिकी हुई है।

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