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मातृदिवस पर विशेष: केक पिघल गया, माँ ठंडी पड़ गई

मातृदिवस पर विशेष: केक पिघल गया, माँ ठंडी पड़ गई।

उझानी बदायूं 10 मई।

मातृदिवस स्टेशन रोड की गली नंबर 3 में सन्नाटा था। 68 साल की सावित्री देवी की लाश से लिपटकर 32 साल का अमित दहाड़ें मार रहा था। हाथ में पकड़ा स्ट्रॉबेरी केक धूप में पिघलकर उसकी उंगलियों से टपक रहा था – ठीक वैसे ही जैसे माँ की साँसें रात में टपक गईं।

“माँ, देख तेरे लिए छुट्टी ली… प्रॉमिस किया था ना इस बार आऊँगा” अमित चीख रहा था। पास पड़ी चारपाई पर सावित्री देवी के हाथ में उसका बचपन का फटा हुआ स्वेटर था। शायद रातभर उसे सीने से लगाकर सोई होंगी।

पड़ोसी कमला ने बताया, “तीन दिन से भूखी थीं। कहती थीं – अमित के हाथ का निवाला खाऊंगी। कल शाम को बोलीं, दरवाजे पर कान लगाकर सोऊंगी, बेटा आएगा तो आवाज सुन लूँ।” रात 2 बजे मोहल्ले के कुत्ते भौंके थे। शायद उसी वक्त सावित्री देवी का दिल बैठ गया – बेटा समझकर।

टेबल पर दो कटोरी खीर ढकी रखी थी। सूख चुकी थी। बगल में नए नोटों की एक गड्डी और पर्ची: “बेटे, बहू के लिए सूट ले लियो। अपनी माँ कंजूस है ना, इसलिए बचाकर रखे थे।”

अमित 3 साल बाद घर आया था। पिछला मातृदिवस फोन पर कहा था – “अगली बार पक्का माँ, बॉस छुट्टी नहीं दे रहा।” इस बार बॉस ने छुट्टी दे दी, पर ऊपर वाले ने माँ छीन ली।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आया: “मृत्यु का समय – रात 2:15 बजे। कारण – हार्ट अटैक।” डॉक्टर बोला, “इंतजार में दिल फट जाता है।”

माँ की अर्थी को कंधा देते वक्त अमित के कुर्ते की जेब से माँ की लिखी आखिरी पर्ची गिरी – “बेटा, तू नहीं आया तो क्या, तेरा इंतजार तो आ गया। वही मातृदिवस है।”

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