धरती स्वर्ग सी सजी थी और मिल रहे थे मन अंजाने
कौन आया कि जला दी बस्ती,किया युद्ध के हवाले ।
वतन की आन की खातिर , तुम्हें हम ढूँढ मारेगें
लहू भगवा मचलता है, कसम सिंदूर की खाके ।
हमारे जख्म गहरे हैं मगर हिम्मत नहीं हारे
तुम्हारी कायराना हरकतों से दिन आज हैं काले ।
नीले नीले आसमान में कर रहीं जौहर वही हैं बेटियाँ
जिन की माँग सूनी कर गई , आतंक भरी राइफलें ।
अब इंसाफ की तारीख भी तुम याद रखना हर बरस
है धरा प्रताप की ,यहाँ वीर लडते हैं ,रोटी घास की खाके ।
सीमा चौहान
बदायूँ














bdnindia.com bdnindia.com | www.bdnindia.com






