1:15 pm Saturday , 15 August 2026
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धरती स्वर्ग सी – सीमा चौहान

धरती स्वर्ग सी सजी थी और मिल रहे थे मन अंजाने
कौन आया कि जला दी बस्ती,किया युद्ध के हवाले ।

वतन की आन की खातिर , तुम्हें हम ढूँढ मारेगें
लहू भगवा मचलता है, कसम सिंदूर की खाके ।

हमारे जख्म गहरे हैं मगर हिम्मत नहीं हारे
तुम्हारी कायराना हरकतों से दिन आज हैं काले ।

नीले नीले आसमान में कर रहीं जौहर वही हैं बेटियाँ
जिन की माँग सूनी कर गई , आतंक भरी राइफलें ।

अब इंसाफ की तारीख भी तुम याद रखना हर बरस
है धरा प्रताप की ,यहाँ वीर लडते हैं ,रोटी घास की खाके ।

सीमा चौहान
बदायूँ

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