


उझानी-बदांयू 28 अक्टूबर।
दीपावली और भैयादूज आते ही कभी बूरा वाली गली में चीनी की चाशनी की महक और भट्टियों की आंच से पूरा बाजार गुलजार रहता था। बहनों की थाली में भाई की लंबी उम्र के लिए रखे जाने वाले चीनी के हाथी-घोड़े, बत्ती और बताशे ही इस त्योहार की असली पहचान थे। लेकिन अब वो मिठास फीकी पड़ गई है।
पिछले एक दशक में महंगाई और बदलते बाजार ने इस 100 साल पुराने पारंपरिक कारोबार को लगभग खत्म कर दिया है। शहर में जो कारखाने 5 से 10 थे, वो अब गिनती के ही बचे हैं।
पुराने कारोबारी गौरव गुप्ता बताते हैं, “10 साल पहले दीवाली के महीने में रोज 1 क्विंटल चीनी की खपत होती थी। कारीगर सुबह से रात तक लगे रहते थे। अब 50 किलो भी खपाना मुश्किल हो रहा है।” पिछले साल तक जो चीनी 44 रुपये किलो मिलती थी, इस साल उसका थोक रेट ही 62 रुपये किलो पहुंच गया है। ऊपर से मजदूरी, लकड़ी/गैस का खर्च अलग। पिछले साल 70 रुपये किलो बिकने वाला बताशा अब थोक में 80 और फुटकर में 100 रुपये किलो बिक रहा है।
इस धंधे की सबसे बड़ी मार भैयादूज पर बिकने वाले चीनी के खिलौनों पर पड़ी है। कारोबारी बांकेलाल कहते हैं, “पहले भैयादूज पर हर बहन अपने भाई के लिए चीनी के हाथी, घोड़े, पालकी, बोरा, बत्ती जरूर ले जाती थी। ये सिर्फ खिलौना नहीं, भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक था। अब 60 रुपये किलो वाला 100 से 110 रूपए किलो हो गया है ग्राहक आता है, दाम पूछकर चॉकलेट ले जाता है।
पहले एक-एक दुकान पर 10-12 क्विंटल खिलौने बनते थे, अब 3-4 क्विंटल बनाकर भी रखे रह जाते हैं।
इस काम को करने वाले अधिकांश कारीगर मुस्लिम समुदाय के हैं, जो पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं। कारीगर सलीम और आमिर ने बताया, “हमारे बाप-दादा यही काम करते थे। अब इस काम में बचत ही नहीं है। 12 घंटे भट्टी के सामने तपने के बाद भी 400-500 रुपये ही मिलते हैं। इसलिए हमने अपने बच्चों को इस काम में नहीं लगाया। वे ई-रिक्शा चलाना पसंद करते हैं।
कारोबारी गौरव और संजीव कुमार ने अपना खुद का कारखाना बंद कर दिया है। उनका कहना है कि खुद बताशा और खिलौना बनाने से अच्छा है, बाहर से बड़े कारोबारियों से सस्ता तैयार माल लाकर बेच लो। लागत और मेहनत दोनों बचती है। यही कारण है कि शहर की अपनी पहचान वाला ये उद्योग धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
त्योहार तो हर साल आएंगे, लेकिन अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ सालों में पूजा की थाली में बताशा और भैयादूज पर चीनी के हाथी-घोड़े सिर्फ किस्सों में ही रह जाएंगे।
राजेश वार्ष्णेय एमके
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