4:53 am Thursday , 5 November 2026
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बलराम श्रीवास्तव को मिला गीत गुलमोहर सम्मान

बलराम श्रीवास्तव को मिला गीत गुलमोहर सम्मान

साहित्य, संस्कृति और कला को समर्पित आचमन फाउंडेशन द्वारा कल ‘गीत गुलमोहर गीत निशा’ का आयोजन किया गया। हिंदी पखवाड़े एवं डॉ. उर्मिलेश जन्म जयंती वर्ष को समर्पित इस आयोजन में मैनपुरी, किशनी से पधारे वरिष्ठ गीतकार श्री बलराम श्रीवास्तव को प्रथम ‘गीत गुलमोहर सम्मान-2026’ प्रदान किया गया।

गीत के प्रति निष्ठा, प्रेम और समर्पण को जीवन में सर्वोपरि मानने की संकल्पना पर आधारित यह सम्मान श्री बलराम श्रीवास्तव को प्रदान किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अपर पुलिस अधीक्षक ग्रामीण श्री हृदेश कठेरिया ने उन्हें अंगवस्त्र एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। इस अवसर पर श्री बलराम श्रीवास्तव की सहधर्मिणी श्रीमती शशि श्रीवास्तव भी उपस्थित रहीं। उनका भी आचमन फाउंडेशन द्वारा सम्मान किया गया।

कार्यक्रम की संकल्पना पुष्प-प्रेम पर आधारित थी। इसी भाव को ध्यान में रखते हुए आचमन फाउंडेशन की संस्थापक डॉ. सोनरूपा विशाल ने श्री बलराम श्रीवास्तव को उपहार स्वरूप मधुमालती की एक बेल भेंट की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह बेल उनके प्रांगण में पुष्पित-पल्लवित होगी और ‘गीत गुलमोहर’ के इस आयोजन की स्मृति को जीवंत रखते हुए इसकी संकल्पना को सार्थक करेगी।

वरिष्ठ साहित्यकार एवं गीतकार श्री नरेंद्र गरल की अध्यक्षता में हुए इस आयोजन का संचालन डॉ. उपदेश शंखधार ने किया। सर्वप्रथम मुख्य अतिथि श्री हृदेश कठेरिया द्वारा माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन किया गया। तत्पश्चात डॉ. उपदेश शंखधार ने श्री बलराम श्रीवास्तव के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आलेख प्रस्तुत किया।

इसके बाद ‘गीत निशा’ का शुभारंभ हुआ। श्री बलराम श्रीवास्तव के मुक्तकों और गीतों से गीत निशा को अभूतपूर्व आयाम मिला। उनके कुछ लोकप्रिय एवं हस्ताक्षर गीतों की श्रोताओं द्वारा विशेष रूप से मांग की गई। गीत की संवेदना और उसकी शुचिता को रेखांकित करते हुए श्री बलराम श्रीवास्तव ने कहा—

“गीत संवेदनाओं का पावन पवन
हो न जाए प्रदूषित, ये संकल्पना।
सत्य, शिव, सुंदरम को समेटे हुए
क्रौंच की आह की सर्जना-अर्चना।
बुझ न जाए कहीं गीत का ये दिया,
वरना उपवन ही श्मशान हो जाएगा।
चुटकुलों को अगर हमने कविता कहा,
गीत का गाँव वीरान हो जाएगा।”

उन्होंने अपनी गीत-यात्रा और गीत की चिरंतनता को स्वर देते हुए यह भी कहा—

“फूल खुशबू को बिखेरे जब तलक,
भ्रमर कलियों पे डेरे जब तलक।
जब तलक पंछी उड़े आकाश में,
जब तलक भी मद रहे मधुमास में।
तब तलक सुर के सफर में
रागिनी गाती रहे,
गीत की यह चाँदनी आती रहे।”

इसके पश्चात कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री नरेंद्र गरल ने अपने अनेक प्रसिद्ध गीतों का रसास्वादन कराया। उन्होंने गीत की प्रभावशीलता और अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता को अभिव्यक्त करते हुए कहा—

“लिए शाकल्य बैठे हैं, हवन करके दिखा देंगे,
कथाएँ वेदनाओं की श्रवण करके दिखा देंगे।”

गीत के प्रति निष्ठा और अच्छी कविता पर आए संकट के इस दौर में विशुद्ध गीतों से रची यह शाम यादगार रही।

इस अवसर पर बिल्सी से पधारे श्री सुबीन माहेश्वरी, डॉ. अक्षय अशेष एवं डॉ. उपदेश शंखधार ने भी काव्य पाठ किया।

भीषण बारिश और प्रतिकूल मौसम के बावजूद अनेक साहित्यप्रेमी इस गीत निशा में उपस्थित रहे और अपनी सहभागिता से कार्यक्रम को सफल बनाया। इनमें श्री गोपाल कृष्ण मिश्र, डॉ. गीतम सिंह, श्री सुबीन माहेश्वरी, भारतेंद्र मिश्र, प्रदीप शर्मा, मधु शर्मा, सुषमा भट्टाचार्य, अमोल पाराशर, माला पाराशर, श्रीमती मंजुल शंखधार, डॉ. कमला माहेश्वरी, डॉ. मधु गौतम, श्री संजय आर्य, अंजली शर्मा, प्रतिभा मिश्रा, गायत्री प्रेरदर्शिनी, कुमार आशीष, रवींद्र मोहन सक्सेना एवं प्रतीश गुप्ता सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

अंत में कार्यक्रम की संयोजक एवं आचमन फाउंडेशन की संस्थापक डॉ. सोनरूपा विशाल ने सभी अतिथियों, रचनाकारों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के सह-संयोजक एवं व्यवस्थापक श्री विशाल रस्तोगी ने भविष्य में भी ऐसी साहित्यिक गोष्ठियों में सभी से निरंतर सहभागिता एवं सहयोग की कामना की और आगे भी इसी प्रकार के साहित्यिक आयोजनों का संकल्प दोहराया।

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