कावड़ बनी पालकी, कंधों पर बैठे माता-पिता… 22 किमी पैदल चलकर बेटों-बहुओं ने रच दी श्रवण कुमार वाली गाथा।
उझानी-बदांयू 16 अगस्त।
सावन की पावन बयार में जब पूरा देश “बम-बम भोले” के जयकारों से गूंज रहा है, तब उझानी क्षेत्र के एक गांव ने मानवता और संस्कारों की ऐसी मिसाल कायम की है जिसे देखकर आंखें नम हो जाती हैं।
क्षेत्र पंचायत के गांव चेतू नगला निवासी 80 वर्षीय गुलकंद सिंह यादव और उनकी धर्मपत्नी रामप्यारी देवी को उनके बेटों और बहुओं ने कावड़ में बिठाकर कछला गंगा से जल भरवाया और लगभग 22 किलोमीटर पैदल चलकर बुर्राफरीदपुर के सुप्रसिद्ध शिवालय में कल सोमवार को जलाभिषेक कराएंगे।
कप्तान सिंह और पत्नी गीता देवी, अरविंद कुमार और पत्नी गुड्डो देवी, रणवीर सिंह और पत्नी पूजा देवी। शनिवार सुबह सबसे पहले पूरे परिवार ने कछला गंगा घाट पर माता-पिता को विधिवत गंगा स्नान कराया। इसके बाद बांस की एक कावड़ सजाई गई। एक पलड़े पर पिता गुलकंद सिंह को और दूसरे पर मां रामप्यारी को विराजमान किया गया। बेटों के साथ बहुओं ने भी बराबर कांधा देकर पति-पत्नी के संबंध व रिश्ते का मान रखा।
“हर-हर महादेव” और “बोल बम” के उद्घोष के साथ कावड़ उठी और चल पड़ी श्रद्धा की यह अनूठी यात्रा। खास बात यह रही कि इस कावड़ को सिर्फ बेटों ने ही नहीं, बल्कि तीनों बहुओं ने भी बारी-बारी से कंधा दिया।
कछला से चलकर यह कावड़ आज बरेली-आगरा राजमार्ग होते हुए गांव छतुईया से गुजरी तो राहगीर ठिठक गए। लोग हाथ जोड़कर नमन करने लगे। कईयों की जुबान से अनायास निकला, यही हैं आज के श्रवण कुमार।
22 किलोमीटर की यह पदयात्रा रविवार की देर शाम बुर्राफरीदपुर स्थित प्राचीन शिवालय पर पहुंचकर पूरी होगी ।
कप्तान सिंह ने बताया कि सुबह में पिता गुलकंद सिंह और मां रामप्यारी से शिवलिंग पर जलाभिषेक कराया जाऐगा और प्रसाद वितरित कर अपना संकल्प पूरा करेंगे।
असली भगवान तो सास-ससुर हैं
इस भावुक पल में बड़ी बहू गीता देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा,
“हमारे लिए असली भगवान हमारे सास-ससुर हैं। जिन्होंने हमें श्रवण कुमार जैसे पति दिए। सावन में भोले बाबा के दर्शन से पहले इनकी सेवा कर लेना ही सबसे बड़ा पुण्य है।
बाजार से गुजरते वक्त समाजसेवी मनीष गोयल ने कहा, इस तरह की कावड़ समाज को आईना दिखाती है। जब बेटे-बहुएं बुढ़ापे में माता-पिता को सिर आंखों पर बैठाएंगे, तभी समाज में बुजुर्गों के प्रति श्रद्धा का भाव जागेगा। यह पूरी पीढ़ी के लिए प्रेरणा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में यह पहला अवसर है जब कावड़ यात्रा में बेटों के साथ बहुओं ने भी बराबर की भागीदारी निभाई। यह उन लोगों के लिए करारा तमाचा है जो वृद्धावस्था में माता-पिता को वृद्धाश्रम की चौखट पर छोड़ आते हैं।
सावन के इस महीने में चेतू नगला के इस परिवार ने साबित कर दिया कि अगर नीयत में श्रद्धा हो तो कावड़ सिर्फ जल लाने का साधन नहीं रहती, वह माता-पिता की पालकी बन जाती है।
राजेश वार्ष्णेय एमके।



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