विवाह एक रिश्ता या दहेज का सौदा?? : समाज दर्पण : प्रदीप प्रजापति के साथ with audio
जब समाज विज्ञान, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, तब यह अत्यंत पीड़ादायक है कि दहेज प्रथा जैसी अमानवीय कुरीति आज भी हमारे बीच जिंदा है — वह भी गर्व से, बिना किसी लज्जा के। एक ऐसी प्रथा, जो कभी पारिवारिक सहयोग का नाम लेकर शुरू हुई थी, अब एक निर्मम सौदेबाज़ी बन चुकी है — जिसमें इंसानियत, रिश्तों और भावनाओं का दम घुटता है। विवाह जो जीवनभर के प्रेम, विश्वास और साझेदारी का प्रतीक होता है, आज धन, वाहन, गहनों और दिखावे की मंडी में बदल गया है।
हर वर्ष देश में न जाने कितनी बेटियाँ दहेज की मांग पूरी न होने पर जलती चिताओं की भेंट चढ़ा दी जाती हैं या उम्रभर अपमान और हिंसा की शिकार बनती हैं। यह केवल एक सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि मानवता पर कलंक है। यह विडंबना ही है कि एक ओर हम नारी सशक्तिकरण की बातें करते हैं, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे लगाते हैं, और दूसरी ओर उसकी शादी के समय उसे बोझ समझकर भारी दहेज देकर विदा करते हैं — जैसे बेटी नहीं, कोई कीमत चुकाई जा रही हो।
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