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स्वतंत्रता संघर्ष का प्रथम उद्घोष – 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जनपद बदायूं एवं जनपदवासियों की भूमिका

स्वतंत्रता संघर्ष का प्रथम उद्घोष–पृष्ठभूमि, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जनपद बदायूं एवं जनपदवासियों की भूमिका

स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम उद्घोष, जो कि सर्वप्रथम मेरठ में प्रारंभ हुआ और देखते-देखते संपूर्ण देश में फैल गया, उसमें बदायूँ भी सम्मिलित हो गया। मेरठ में उपद्रव होने की सूचना बदायूँ में 5 मई को पहुँच गई। यहाँ तुरंत असंतोष की ज्वाला धधक उठी।
उस समय यहाँ का कलेक्टर विलियम एडवर्ड्स हुआ करता था। इसके अतिरिक्त तीन और अंग्रेज अधिकारी उसके साथ मौजूद थे। सबसे पहले बेहटा गुसाई में उपद्रव प्रारंभ हुआ। धीरे-धीरे सारे जिले में अराजकता फैल गई।
1 जून, 1857 को खजाने के पहरेदारों ने विद्रोह कर खजाना लूट लिया, जेल तोड़ दी गई, सभी कैदी रिहा कर दिए गए। कलेक्टर एडवर्ड्स बदायूँ छोड़कर फतेहगढ़ को पलायन कर गया। इसी बीच बरेली से कुछ स्वतंत्रता सेनानी बदायूँ पहुँच गए, जिनके साथ विद्रोह करने वाले सम्मिलित हो गए। नगला शर्की के लोगों ने अदालत, मुंसिफी तथा थाने को नष्ट कर दिया। बिल्सी में नील के कारखानों को नष्ट कर दिया गया। बिसौली में अजीज खाँ ने तहसील का रुपया लूट लिया।
बरेली के नवाब खान बहादुर खाँ ने 17 जून को अब्दुर्रहमान खाँ को स्वतंत्र बदायूँ का प्रथम कलेक्टर एवं नाजिम मुकर्रर किया, जिसने शासन को सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया। कुछ समय तक देशी हुकूमत बदायूँ में रही। शीघ्र ही अंग्रेजी फौजों ने बदायूँ पर आक्रमण कर दिया।
छुटपुट मुकाबले के बाद ककराला के मुकाम पर विद्रोहियों की फौजों तथा अंग्रेज फौजों में मुकाबला हुआ। अंग्रेजी फौज का जनरल पेनी (27 अप्रैल, 1858) मारा गया, लेकिन जीत अंग्रेजों की ही हुई। इसके पश्चात् अंग्रेजी सेना ने पूरे जिले पर अपना अधिकार कर लिया। बिसौली से मेजर गार्डेन ने सभी विद्रोही हटा दिए। इस्लामनगर में वकील रामनरायन पर रामपुर की फौजों ने आक्रमण करके पकड़ लिया और वह वीरगति को प्राप्त हुए।
अंततः कार्मिकल को बदायूँ का कलेक्टर बनाया गया, जिसने शेखपुर के राजपूत एवं दातागंज के राजपूतों की मदद से जिले में अंग्रेजी शासन स्थापित करने का प्रयास किया। इसी समय शाहजहाँपुर की ओर से आने वाली अंग्रेजी फौजों ने उसहेत के तीन गाँवों में आग लगा दी तथा बदायूँ के कलेक्टर कार्मिकल ने सहसवान के तीन गाँव जला दिए।
सहसवान और इस्लामनगर थाने से पकड़े गए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को इस्लामनगर थाने में फाँसी लगाई तथा बदायूँ एवं आसपास की जगह से पकड़े गए क्रांतिकारियों को कलेक्टर, बदायूँ के परिसर में खड़े पेड़ की पेड़ पर लटकाकर फाँसी दी गई तथा लाशों को निकट कुंए में डाल दिया। ये स्थान आज भी ‘शहीद स्थल’ एवं ‘शहीद स्मारक’ के नाम से कलेक्टर, बदायूँ परिसर में मौजूद है।
अगस्त के महीने में एक शांति स्थापित हो गई तथा अंग्रेजों द्वारा पुनः मालगुजारी वसूल करना आरंभ हो गया। इसी समय में जनपद का संपूर्ण भाग अंग्रेजों के अधीन हो गया। विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लिया गया। उनको फाँसियाँ दी गईं। अंग्रेजों की मदद करनेवालों को इनाम दिए गए।

1857 की क्रांति के स्मरणीय अमर शहीद
सन् 1857 का यह विद्रोह केवल ‘सैनिक विद्रोह’ ही नहीं था और न ही यह केवल ‘शहरी विद्रोह’ था, वरन् यह जिला बदायूँ के कोने-कोने में फैल गया था तथा गाँव-गाँव के लोग इसमें कूद पड़े थे।
गुनौर परगना के ग्राम न्योरा, ज्योंगा भिरवटी के ग्रामवासी, बढ़गैली के सीताराम अहीर, नगला अजमेरी के सैफुद्दीन, कोट और बिल्सी परगना के आनंद सिंह, गुदनी के जमींदार लेखराज सिंह और थम्मन सिंह, शोभा सिंह, सेवाराम, भिटौरा के नारायण सिंह, सरतौल के भाऊ सिंह, दियोरिया के सीता परिया, रहरिया के जमींदार फतेह सिंह, उझानी परगने के लोचन सिंह, संजरपुर के बादाम सिंह, ककरौली के भूप सिंह, मिरसली के जमींदार चिता सिंह, कस्योमा के मान सिंह और माधो सिंह, ककोआ के हरहर सिंह, कचोरा के जगमोहन सिंह, बदायूँ परगने के ग्राम खुनक के भाई सिंह, छियाबाद के धन सिंह, रसूलपुर के जयमाल सिंह और सुबरन सिंह, नगला शर्की के तुलसी सिंह, ककराला के सरदार सोमहराम खाँ, वजीर अहमद और उनके साथी, सलेमपुर के ठाकुर कीरत सिंह, बेलाडाँडी के यदवावर सिंह, हतसा के नबी खाँ, बिसौली के अजीज खाँ व निहाल सिंह, सहसवान परगने के हैदर खाँ, फतेह अली खाँ, करियामई के रामानंद, बबराला के सुमेर सिंह, मकरौली के भूर सिंह, पीपरी के नारायण सिंह, भौंस के लक्ष्मण सिंह और गुलाब सिंह तथा इस्लामनगर के रामनारायण, शहामत अली, मेहर सिंह, नासिर अली, धन सिंह तथा बदन सिंह आदि के नाम 1857 के विद्रोह में भाग लेनेवालों में उल्लेखनीय हैं। आज भी लोग इनकी वीरता के किस्से बहुत गर्व के साथ याद करते हैं।

क्रांतिकारी मौलाना अहमदुल्लाह
इस इलाके की लड़ाई का नेतृत्व शाहजहाँपुर निवासी मौलाना अहमदुल्लाह शाह ने 1857 की आजादी की लड़ाई में किया। उन्होंने दिल्ली में मुगल बादशाह की मदद की। 1857 की क्रांति के दौरान मौलाना साहब ने अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा लिया तथा दिल्ली के आसपास भी लड़े।
जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया, तब मौलाना साहब लखनऊ चले गए। वहाँ भी जोश से लड़े। जब लखनऊ की फौज की हार हुयी हुई, तब मौलाना साहब ने रुहेलखंड में मोर्चा संभाला व ककराला में अंग्रेजी फौज से लड़े। यहाँ अंग्रेजों से हार के बाद मौलाना साहब मोहम्मदी में अंग्रेजों से लड़े, लेकिन जब हिन्दुस्तानियों की हार के बाद मौलाना साहब रूपोश हो गए। इन्होंने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। ऐसे वीर क्रांतिकारी को जन्म देने का फ़ख़्र बदायूँ को है।
सन् 1857 की क्रांति में ककराला का योगदान
अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 के संग्राम में ककराला के नागरिकों ने आजादी के लिए संघर्ष में विशेष योगदान दिया। कुछ महीने विदेशी हुकूमत से आजाद रहने के पश्चात् अप्रैल 1858 में अंग्रेजी फौजों ने बदायूँ पर अधिकार करने के लिए आक्रमण किया। आजादी की इस लड़ाई में मदद माँगने बहादुरशाह का पुत्र फिरोजशाह भी ककराला आया था।
20 जनवरी को जनरल नियाजी मुहम्मद खाँ ने एक बड़ी फौज लेकर फतेहगढ़ के लिए प्रस्थान किया, जिसमें ककराला की टुकड़ी भी शामिल हो गई। सूरजपुर घाट से गंगा पार की और फर्रुखाबाद की सीमा में पहुँच गए। 26 जनवरी को नियाजी मुहम्मद की फौज पर जनरल ग्रांट ने अचानक हमला कर दिया, जिसमें सेनानियों को हार का सामना करना पड़ा।
बाद में यह जानकारी हुई कि अंग्रेजी सेना का हमला कादरगंज के लोगों से मिलकर किया गया। उन्होंने सेनानियों की मुखबिरी कर दी। सेनानियों ने गुस्से में कादरगंज में आग लगा दी।
जनरल वजीर खाँ ने सेनानियों को फिर इकट्ठा किया। अबकी बार सेनानियों की संख्या और जोश दोनों बढ़े हुए थे। इसकी खबर जब अंग्रेज सेना को मिली तो विद्रोह को दबाने के लिए 27 अप्रैल को जनरल पैनी और विल्सन ततारपुर से गंगा पार कर उसैहत की तरफ आ गए।
उस वक्त उनके साथ तोपखाना, 200 अंग्रेज जवान, 200 मुल्तानी सवार, तीन रेजीमेंट और 350 बिल्लौची मौजूद थे। जनरल पैनी ने मार्च करने का हुक्म देते हुए कहा कि ककराला से 4 मील के फासले पर नवाब की फौज पड़ी हुई है, उस पर हमला करना है; लेकिन वहाँ नवाब की फौज जा चुकी थी, सिर्फ ककराला की टुकड़ी मौजूद थी।
वजीर अहमद और फौज अहमद फैज और उनके साथियों के साथ मुकाबला हुआ। जंग में ककराला के बहुत से लोग मारे गए, मगर अंग्रेजों का एक बहुत महत्वपूर्ण युद्ध विशेषज्ञ जनरल पैनी भी मारा गया।
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अंग्रेजों को इतनी बड़ी फौज का मुकाबला ककरालावाले नहीं कर सकते थे, इसलिए वह बदायूँ की तरफ भाग गए और गुलाम खाँ, जो ककराला के एक बहुत बहादुर नौजवान थे, अपनी ससुराल पलथा (बरेली) की ओर गए, मगर जख्मों के कारण रास्ते में गिर गए। ककराला के सुसरालवालों की हिम्मत भी नहीं हुई कि वह उनको उठाकर लाते। इस जंग के बाद अंग्रेजों ने अपने तोपखाने और फौज से पूरे जिले पर अधिकार कर लिया।
ककराला के निवासी एवं लेखक सोहराब ककरालवी बताते हैं कि इस संग्राम में ककराला के बहुत से लोगों ने हिस्सा लिया, जिसमें प्रमुख हैं—पहलवान मंगल खाँ, रुस्तम खां, गुलामी खां, मु. बान खां, चाहरम खां, दिलावर खां, वासल खां, फौजदार खां और मेहराब खां महत्वपूर्ण थे

ककराला में ब्रिगेडियर कुक के जुल्म
इस जंग और जनरल पैनी की मृत्यु का बदला लेने ब्रिगेडियर कुक ने ककराला में एक जेलखाना बनवाई, जिसमें ककराला के लोगों को रखा गया। उन लोगों में से रोजाना 5 लोगों को सबके सामने गोली मार दी जाती थी। यह सिलसिला लगभग एक माह तक चला।
मरने से पहले उनकी पीठ पर चूने का निशान लगवाकर दो घंटा खड़ा करके कान में गोली मरवाता था। जो बच जाते, उनको दोबारा और तिबारा गोली मरवाकर हलाक करता था। उनका गल्ला और सामान भी जलवा देता था।
फौज के साथ जनरल पैनी की मेम भी ककराला पहुँची थी। उसने आबादी को जला देने का हुक्म दिया। ककराला जुल्मों से वीरान कर दिया गया। ककराला के लोगों को गेहूँ बोने पर पाबंदी लगा दी। सिर्फ खाने के लिए थोड़ी जमीन में जौ और मक्का कर सकते थे। बाकी नील की खेती करनी होती थी।
उसके संग्रह के लिए ककराला-अलापुर रोड पर अंग्रेजों ने एक कोठी का निर्माण कराया। आज वहाँ ककराला की घनी आबादी है। यह मोहल्ला आज भी ‘कोठी मोहल्ला’ कहलाता है।
ककराला अंग्रेजों के जुल्मों से वीरान हो गया और जमीन बंजर हो गई, लेकिन ककराला वासियों ने बुलंद हौसलों से अपने को फिर आबाद कर लिया।

यह लेख बदायूं क्लब बदायूं के सचिव साहित्यकार एवं इतिहासकार डॉ. अक्षत अशेष द्वारा लिखित पुस्तक “उत्तर प्रदेश का स्वतंत्रता संग्राम : बदायूं ” में प्रकाशित है

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