बुराइयों का अंत ही रावण का अंत है :आचार्य संजीव रूप
बिल्सी , तहसील क्षेत्र के यज्ञ तीर्थ गुधनी में स्थित प्रज्ञा यज्ञ मंदिर में दशहरा का पावन पर्व श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय वैदिक विद्वान आचार्य संजीव रूप ने वैदिक यज्ञ संपन्न कराया तथा उपस्थित लोगों को दशहरा पर्व का वास्तविक अर्थ समझाते हुए अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करने का आह्वान किया।
आचार्य संजीव रूप ने कहा कि राम और रावण का युद्ध केवल दो व्यक्तियों का युद्ध नहीं, बल्कि अच्छाई और बुराई के बीच का संघर्ष है। रावण का अंत तभी सार्थक है, जब हम अपने भीतर छिपी बुराइयों का अंत करें। यदि हम अपने अंदर बुराइयों को पालकर रखते हैं, तो वास्तव में हम स्वयं रावण को जीवित रखे हुए हैं।
उन्होंने कहा कि बुराई कभी भी व्यक्ति, परिवार, समाज या राष्ट्र को आगे नहीं बढ़ने देती। सच्ची उन्नति का मार्ग अच्छाई, सत्य, सदाचार, ईमानदारी और कर्तव्यपालन से होकर गुजरता है। जिस प्रकार भगवान श्रीराम ने मर्यादा, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर आदर्श प्रस्तुत किया, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में श्रेष्ठ गुणों को अपनाना चाहिए।
आचार्य संजीव रूप ने कहा कि यदि हम जुआ खेलते हैं, बीड़ी पीते हैं, नशा करते हैं, अहंकार पालते हैं, रिश्वत लेते हैं, चोरी करते हैं, झूठ बोलते हैं अथवा अपने वचन का पालन नहीं करते, तो हमें आत्मचिंतन करना चाहिए। ये सभी बुराइयां हमारे भीतर के रावण का प्रतीक हैं। इनका त्याग करना ही वास्तविक विजयादशमी है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम की सच्ची जय तभी होगी, जब हम अपने जीवन से बुराइयों को विदा करके अच्छाइयों को अपनाएंगे। ईश्वर की कृपा पाने के लिए सत्य, सदाचार, परोपकार और धर्मानुसार आचरण करना आवश्यक है। दशहरा हमें केवल रावण के पुतले का दहन करने की नहीं, बल्कि अपने अहंकार, छल, कपट, व्यसन और अन्य दुर्गुणों को समाप्त करने की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम में राकेश आर्य, मास्टर अगरपाल सिंह, श्रीमती संतोष कुमारी, श्रीमती रेखा रानी, कोषकी रानी, श्रीमती लीलावती देवी सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे। आर्य संस्कारशाला के बच्चों ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की।

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