Kaveri Gupta ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो दिल में हज़ार दर्द उठे मगर आँख तर न हो। मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब दो-चार साल तक तो इलाही सहर न हो। उल्फत की क्या उम्मीद वो ऐसा है बेवफ़ा सोहबत हज़ार साल रहे मगर कुछ असर न हो।