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सभ्यता, संतुलन और संस्कृति – Laxmi Singh

Laxmi Singh

जिस प्रकार किसी को मनचाही गति से वाहन चलाने का अधिकार नहीं होता, क्योंकि सड़क सार्वजनिक होती है—
उसी प्रकार सार्वजनिक जीवन में किसी को भी मर्यादा से बाहर आचरण या वेश-भूषा का अधिकार नहीं हो सकता, क्योंकि जीवन भी एक साझा सामाजिक व्यवस्था है।

एकांत सड़क पर गति की स्वतंत्रता हो सकती है,
और एकांत स्थान पर व्यक्ति की निजी पसंद भी।
परंतु जैसे ही हम सार्वजनिक क्षेत्र में कदम रखते हैं, वहाँ नियम और मर्यादा सभी पर समान रूप से लागू होती है।

लड़कियों के अर्धनग्न वस्त्र पहनने के प्रश्न को उठाना उतना ही आवश्यक है,
जितना लड़कों द्वारा शराब पीकर वाहन चलाने के विषय को।
दोनों ही स्थितियों में सामाजिक “दुर्घटना” की संभावना बढ़ती है।

व्यक्ति की इच्छा घर की चारदीवारी तक सीमित रहनी चाहिए।
घर के बाहर—सार्वजनिक जीवन में—स्त्री हो या पुरुष,
सभी को सामाजिक मर्यादा का पालन करना ही चाहिए।

जिस प्रकार घूंघट और बुर्का अतिशयता का उदाहरण हो सकते हैं,
उसी प्रकार अर्धनग्नता भी संतुलन से बाहर की स्थिति है।
अतिवाद—किसी भी दिशा में—स्वस्थ समाज का आधार नहीं बन सकता।

फैशन के नाम पर ऐसी वेश-भूषा अपनाना,
जो न उम्र के अनुरूप हो, न गरिमा के—
भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता।

जीवन गिटार या वीणा जैसे वाद्य यंत्र की तरह है—
तार बहुत कस जाए तो टूट जाता है,
और बहुत ढीला छोड़ दिया जाए तो सुर बिगड़ जाता है।
संतुलन ही सौंदर्य है।

संस्कार केवल स्त्री के लिए नहीं, पुरुष के लिए भी उतने ही आवश्यक हैं।
जीवन-रूपी गाड़ी के दोनों पहियों में संस्कार की हवा होनी चाहिए—
एक भी पहिया पंचर हुआ, तो यात्रा बाधित हो जाएगी।

यदि नग्नता को आधुनिकता की पहचान माना जाए,
तो सबसे अधिक “आधुनिक” तो वे जीव होंगे
जिनकी संस्कृति में वस्त्रों का कोई स्थान ही नहीं है।
सभ्य मनुष्य को पशुता से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए,
बल्कि सभ्यता और संस्कृति को अपनाना चाहिए।

पशु कहीं भी मल-मूत्र त्याग सकते हैं—
पर सभ्य मनुष्य को शौचालय का उपयोग करना होता है।
उसी प्रकार, पशु नग्न रह सकते हैं—
पर सभ्य समाज में रहने वाले मनुष्य से
उचित और मर्यादित वस्त्रों की अपेक्षा स्वाभाविक है।

अतः विनम्र अनुरोध है—
सार्वजनिक जीवन में मर्यादा का उल्लंघन न करें,
सभ्यता, संतुलन और संस्कृति के साथ जीवन जिएँ।

✍️लक्ष्मी सिंह

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