बदायूं की बात- सुशील धींगडा के साथ
क्षेत्र के विकास को लेकर राजनेतिक कब और कौन सी राह पर चलना शुरू कर दें इसका आम आदमी तो क्या भगवान को भी पता नहीं होता। कहावत तो यह है कि सेहत के मामले में चिकित्सक इस धरती पर भगवान का रूप होते हैं परंतु इस कहावत को मेडीकल के क्षेत्र में कमीशन और जांच ने दूर सा कर दिया ह ैअब तो यह कहा जा सकता है कि आर्थिक युग में कभी धरती के भगवान कहे जाने वाले चिकित्सक तिजोरी भरने का मार्ग बन गए है जबकि क्षेत्र के विकास की बात की जाए तो ऐसा लगता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनेतिक भगवान का रूप धारण कर चुकें हैं। कभी वह समय था राजनति को कभी समाजसेवा कहा जाता है लेकिन जब से राजनीति में निधि का समावेश हुआ तक से आम आदमी को ऐसा लगने लगा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निधि व्यवस्था आने के बाद समाजसेवा का यह रास्ता धनवान बनने का वह रास्ता बन गया है जिसमें कुछ समय चरण वंदना करके सफल राजनेतिक बनने वाला अपने पूरे परिवार और उसकी सात पीडियों कुबेर का खजाना हाथ में दे देता है।
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