12:40 pm Monday , 17 August 2026
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सोमवार विशेष- Ratna Nautiyal

Ratna Nautiyal

🌸 सोमवार विशेष: भगवान शिव की स्तुति का सबसे सुंदर रूप। जो भी इसे सच्चे मन से पढ़ता है, महादेव उसके सारे दुख हर लेते हैं। ॐ नमः शिवाय! 🔱

हर सोमवार को श्री रुद्राष्टकम का पाठ अवश्य करें! 🔱
भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने और जीवन के सभी दुखों से मुक्ति पाने के लिए इस चमत्कारी ‘श्री रुद्राष्टकम’ का पाठ अत्यंत फलदायी है। आइए सच्चे मन से महादेव की स्तुति करें:
॥ श्री रुद्राष्टकम ॥
✨ श्लोक 1:
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥
👉 अर्थ: हे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। माया से रहित, गुणों व भेदों से परे, इच्छारहित और आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले आपको मैं भजता हूँ।
✨ श्लोक 2:
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥
👉 अर्थ: जो निराकार हैं, ओंकार के मूल हैं, वाणी और इंद्रियों से परे हैं। जो महाकाल के भी काल, कृपालु और गुणों के धाम हैं, उन परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
✨ श्लोक 3:
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥
👉 अर्थ: जो हिमाचल के समान गौरवर्ण हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति है। जिनके सिर पर सुंदर गंगा जी, मस्तक पर बाल चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित हैं।
✨ श्लोक 4:
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥
👉 अर्थ: जिनके कानों में कुंडल झूम रहे हैं, जिनके विशाल नेत्र और प्रसन्न मुख है। नीलकंठ, दयालु, बाघम्बर और मुंडमाला धारण करने वाले सबके नाथ श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ।
✨ श्लोक 5:
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥
👉 अर्थ: जो प्रचंड, श्रेष्ठ, परमेश्वर, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले हैं। त्रिशूल धारण करने वाले और प्रेम से प्राप्त होने वाले माता भवानी के पति श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ।
✨ श्लोक 6:
कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥
👉 अर्थ: जो कलाओं से परे, कल्याण स्वरूप और प्रलय करने वाले हैं। सज्जनों को आनंद देने वाले और कामदेव के शत्रु हे प्रभो! आप मुझ पर प्रसन्न होइए।
✨ श्लोक 7:
न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति संतापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥
👉 अर्थ: जब तक मनुष्य उमापति महादेव के चरण कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इस लोक में सुख-शांति मिलती है और न परलोक में। हे समस्त जीवों के हृदय में बसने वाले प्रभो! प्रसन्न होइए।
✨ श्लोक 8:
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥
👉 अर्थ: हे शम्भो! मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा। मैं तो बस सदा आपको नमस्कार करता हूँ। बुढ़ापा और जन्म-मृत्यु के दुखों से जलते हुए मुझ दुखी की रक्षा कीजिए।
🌿 फलश्रुति:
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भु: प्रसीदति॥
(जो भी मनुष्य इस रुद्राष्टकम का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, उन पर भगवान शम्भु सदैव प्रसन्न रहते हैं।)
👇 कमेंट में सच्चे मन से लिखें: “ॐ नमः शिवाय” 🙏 भगवान शिव की स्तुति का सबसे सुंदर रूप। जो भी इसे सच्चे मन से पढ़ता है, महादेव उसके सारे दुख हर लेते हैं। ॐ नमः शिवाय! 🔱

हर सोमवार को श्री रुद्राष्टकम का पाठ अवश्य करें! 🔱
भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने और जीवन के सभी दुखों से मुक्ति पाने के लिए इस चमत्कारी ‘श्री रुद्राष्टकम’ का पाठ अत्यंत फलदायी है। आइए सच्चे मन से महादेव की स्तुति करें:
॥ श्री रुद्राष्टकम ॥
✨ श्लोक 1:
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥
👉 अर्थ: हे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। माया से रहित, गुणों व भेदों से परे, इच्छारहित और आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले आपको मैं भजता हूँ।
✨ श्लोक 2:
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥
👉 अर्थ: जो निराकार हैं, ओंकार के मूल हैं, वाणी और इंद्रियों से परे हैं। जो महाकाल के भी काल, कृपालु और गुणों के धाम हैं, उन परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
✨ श्लोक 3:
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥
👉 अर्थ: जो हिमाचल के समान गौरवर्ण हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति है। जिनके सिर पर सुंदर गंगा जी, मस्तक पर बाल चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित हैं।
✨ श्लोक 4:
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥
👉 अर्थ: जिनके कानों में कुंडल झूम रहे हैं, जिनके विशाल नेत्र और प्रसन्न मुख है। नीलकंठ, दयालु, बाघम्बर और मुंडमाला धारण करने वाले सबके नाथ श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ।
✨ श्लोक 5:
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥
👉 अर्थ: जो प्रचंड, श्रेष्ठ, परमेश्वर, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले हैं। त्रिशूल धारण करने वाले और प्रेम से प्राप्त होने वाले माता भवानी के पति श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ।
✨ श्लोक 6:
कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥
👉 अर्थ: जो कलाओं से परे, कल्याण स्वरूप और प्रलय करने वाले हैं। सज्जनों को आनंद देने वाले और कामदेव के शत्रु हे प्रभो! आप मुझ पर प्रसन्न होइए।
✨ श्लोक 7:
न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति संतापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥
👉 अर्थ: जब तक मनुष्य उमापति महादेव के चरण कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इस लोक में सुख-शांति मिलती है और न परलोक में। हे समस्त जीवों के हृदय में बसने वाले प्रभो! प्रसन्न होइए।
✨ श्लोक 8:
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥
👉 अर्थ: हे शम्भो! मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा। मैं तो बस सदा आपको नमस्कार करता हूँ। बुढ़ापा और जन्म-मृत्यु के दुखों से जलते हुए मुझ दुखी की रक्षा कीजिए।
🌿 फलश्रुति:
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भु: प्रसीदति॥
(जो भी मनुष्य इस रुद्राष्टकम का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, उन पर भगवान शम्भु सदैव प्रसन्न रहते हैं।)
👇 कमेंट में सच्चे मन से लिखें: “ॐ नमः शिवाय” 🙏

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