उझानी -शिक्षा के आँगन का एक दीप बुझा: मुजफ्फर हुसेन मिर्जा जी नहीं रहे।
उझानी-बदांयू 25 मई।
“गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।।”
कबीर की इन पंक्तियों को जीवन भर चरितार्थ करने वाले, महात्मा गाँधी पालिका इण्टर कालेज के सेवानिवृत्त अध्यापक मुजफ्फर हुसेन मिर्जा जी सरस्वती के उस धाम की ओर प्रयाण कर गए जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।
मोहल्ला साहूकारा कटरा, उझानी के निवासी मिर्जा साहब ने गत रात्रि लगभग 11 बजे अपने निवास पर अंतिम साँस ली। हृदयगति रुकना केवल एक चिकित्सकीय कारण रहा, वास्तव में तो वह हृदय था ही इतना बड़ा कि उसमें हजारों विद्यार्थियों का भविष्य बसता था।
पुत्र सईद मिर्जा, जो स्वयं लेखपाल हैं, ने बताया कि अब्बा लंबे समय से अस्वस्थ थे। दिल्ली के एक निजी अस्पताल में इलाज के बाद भी नियति को कुछ और ही मंजूर था। जीवन की श्यामपट्ट पर वे अपना पाठ पूरा लिखकर, खड़िया रखकर चले गए।
मिर्जा साहब केवल चॉक-डस्टर तक सीमित अध्यापक नहीं थे। वे चलती-फिरती पाठशाला थे — जहाँ उर्दू की नज़ाकत थी, हिंदी का अपनापन था और गणित का अनुशासन भी। उनके पढ़ाए बच्चे आज डॉक्टर, वकील, शिक्षक और अफसर बनकर समाज की बगिया महका रहे हैं।
“मौत उस की है करे जिसका ज़माना अफ़सोस,
यूँ तो दुनिया में सभी आए हैं मरने के लिए।”
आज दोपहर दो बजे उझानी का कब्रिस्तान उनका आखिरी घर बनेगा, तब एक युग का अंत होगा। ब्लैकबोर्ड सूना लगेगा, कुर्सी-मेज़ उदास होंगी, और प्रार्थना सभा में एक स्वर हमेशा के लिए मौन हो जाएगा।
पर सच यही है कि शिक्षक मरते नहीं। वे अपने शिष्यों की आँखों में, उनके आचरण में, उनकी सफलता में ज़िंदा रहते हैं। मिर्जा साहब भी उझानी की गलियों में, अपने शागिर्दों की कामयाबी में हमेशा पढ़ाते रहेंगे।
राजेश वार्ष्णेय एमके।

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