5:27 pm Friday , 14 August 2026
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जोत से जोत जलाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो ?

बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
बदायूं की राजनीति में सहभागिता करने वालों के रंग कुछ इस तरह दिखते हैं कि बाहर वालों के साथ उनके सम्बन्ध अच्छे होते हैं लेकिन अपनी पार्टी में हर समय साथ दिखने वाले पर्दे के पीछे उनके सबसे बडे धुुरविरोधी हुआ करते है, आम आदमी इस बात को महसूस कर चुका है और जान गया है इसी के चलते काग्रेस, भाजपा, सपा अथवा बसपा कोई राजनेतिक दल हो उसके पदाधिकारी आपस में एक नहीं हैं। बिसौली का मामला इसी मामले से जुडा एक प्रकरण दिखाई देता है जहां कभी सांसद धर्मेंद्र यादव के सबसे विश्वासपात्र दिखने वाले बिसोली के विधायक आज विरोधी राजनेतिक दल की नाव में सवार होने की तैयार में हैं जबकि भाजपा से बिसौली के पराजित उम्मीदवार किसी नई नाव की तलाश में दिखेगें, ऐसा इस लिए चर्चा का विषय बना हुआ है क्योकि बिसौली में सपा से उतरकर विधायक बनने वाले भाजपा से मैदान में होगें तो भाजपा से पराजित उम्मीदवार पूर्व विधायक के पास एक ही रास्ता होगा कि वह कोई नया राजनेतिक दल देखें अथवा चुनाव से अलग हो जाएं। उसहैत को लेकर दो प्रमुख दलों के उम्मीदवारों के चयन का मामला भी आपसी गुटबाजी की राह बनाता दिखा सकता है। बिल्सी में भले अभी सब सामान्य दिख रहा हो लेकिन गुटबाजी के चलते एक विपक्षी दल में भी चुनाव से पूर्व भगदड दिखाई देने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। गुटबाजी के चलते पांच बार के भाजपा विधायक राम सेवक सिंह राजनीति से किस तरह दूर किए गए यह भी किसी से छिपा नहीं है। सत्ताधारी दल सहसवान क्षेत्र में आजादी के बाद से कमजोर रहा है इसको सब मानते हैं लेकिन गुटबाजी के चलते पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम यादव का टिकट मिलने के मामले में कौन – एक अंदरखाने और कौन सामने विरोध करता है इसको भी आम आदमी खूब समझ गया है।
विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और समय रहते गुटबाजी की रार दूर नहीं हुई तो राजनेतिक दल कोई हो परिणाम फिर ढाक के तीन पात ही दिखाई देगा इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।

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