Gunjan Agrawal
वो फल का एक छोटा सा बीज था
जो खुद को दरख़्त समझने की भूल कर बैठा था
कुछ वक़्त क्या गुजरा धूप में
वो अपनी औकात से बड़ा ख्वाब देख बैठा था.
जिस मिट्टी ने उसे पनाहदी
उसी मिट्टी को कमतर समझने लगाथा
चंद बूंदें क्या मिली बारिश की
वो समंदर से मुक़ाबला करने लगा था.!!
गुंजन शिशिर
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