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उझानी – हस्तकरघा परंपरा सांस्कृतिक चेतना और आत्मनिर्भरता की प्रतीक – रवि जी समदर्शी

उझानी – हस्तकरघा परंपरा सांस्कृतिक चेतना और आत्मनिर्भरता की प्रतीक – रवि जी समदर्शी।

उझानी-बदांयू 9 अगस्त।

मेरे राम आश्रम में रविवार को आयोजित हैंडलूम उत्सव में वक्ताओं ने भारतीय हस्तकरघा परंपरा, स्वदेशी उत्पादों और आत्मनिर्भरता के महत्व पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता रवि जी समदर्शी महाराज ने कहा कि भारतीय हस्तकरघा परंपरा हमारी सनातन सांस्कृतिक चेतना, शिल्प-कौशल और श्रम-साधना की अनुपम अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा, “हथकरघे पर तैयार होने वाले वस्त्र केवल परिधान नहीं हैं, बल्कि ये पीढ़ियों से चली आ रही कला, परंपरा और सृजनशीलता के जीवंत दस्तावेज हैं।

रवि जी ने स्वदेशी को अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि स्थानीय बुनकरों और शिल्पकारों को बढ़ावा देकर उनकी आजीविका मजबूत की जा सकती है। इससे देश की अर्थव्यवस्था स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि स्वदेशी का आग्रह राष्ट्रहित, सांस्कृतिक अस्मिता और आर्थिक स्वाभिमान से जुड़ा है। हर व्यक्ति को अपनी जरूरत की वस्तुओं में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

गायत्री परिवार के संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में श्रम को साधना, स्वावलंबन को जीवन-मूल्य और लोकमंगल को परम ध्येय माना गया है। हस्तकरघा उद्योग न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देता है।

उन्होंने कहा, स्वदेशी उत्पादों को अपनाना सिर्फ खरीदारी नहीं है, बल्कि यह बुनकरों, श्रमिकों और कारीगरों के परिश्रम के प्रति सम्मान है। स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता मिलने से आर्थिक संसाधन स्थानीय स्तर पर ही रहेंगे और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। उन्होंने समाज के हर वर्ग से आग्रह किया कि स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को दिनचर्या का हिस्सा बनाकर आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को मजबूत करें।

कार्यक्रम के अंत में समाजसेवी आदित्य गुप्ता और देवेंद्र पाल ने गायत्री मंत्र का पटका पहनाकर रवि जी समदर्शी महाराज को सम्मानित किया। इस अवसर पर सौम्या शर्मा, हेमंत सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

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