धीरे-धीरे – प्रियंका विवेक सिंह
मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर,
मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।
सूरज नहीं बन सका तो हुआ क्या,
मैं दीपक ही बनकर जला धीरे-धीरे।
मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर,
मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।
थी ख्वाहिश की इंसानियत को बनाऊ ,
बना भी रहा हूं मगर धीरे-धीरे।
ना धोखा ना हड़पा किसी का कभी कुछ,
मैं पहुंचा यहां तक मगर धीरे-धीरे।
नहीं कोई पर्वत सा सहारा मेरे पास,
मैं तूफान से लड़ता रहा धीरे-धीरे।
देखने में कश्ती तो छोटी बहुत है,
तैरा समंदर भी मगर धीरे-धीरे।
मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर,
मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।
प्रियंका विवेक सिंह
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