(मंजिल को पा गया ) गिर गिर के जो उठा है वह मंजिल को पा गया।
जो डर गया वही आज पीछे रह गया।
डरना नहीं तुम्हें कसम, तुम्हें ही चलना है।
ठोकर लगे अगर कभी, उठ दौड़ लगाना ।
तुम हो भविष्य देश की, देश के हो बीर।
झुकने नहीं देना कभी, माता का अपने सिर।
जिद पे अपने डिगे रहो, मंजिल को पाओगे।
अभी तो अश्क है मगर कल मुस्कुराओगे ।
दर्द को भी जिसने ,अपना हथियार बनाया।
इतिहास भी उसी का तलब गार बन गया।
जो डर गया वहीं तो ,आज पीछे रह गया।
गिर गिर के जो उठा है, वह मंजिल को पा गया ।
जो डर गया वही तो आज पीछे रह गया ।
प्रियंका विवेक सिंह
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