Jaya
Jaya__Kishori__
आज का वैदिक भजन
ईश्वर की अजब माया
कहीं धूप कहीं छाया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
भौतिक सुख – वैभव का
यूँ ही अभिमान करे
पापों की जो सिर पर धरी
गठरी का न ध्यान धरे
जो बीत गया वो पल
क्या लौट कभी पाया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
ईश्वर की अजब माया
कहीं धूप कहीं छाया
रिश्ते नातों का क्या
कोई साथ न जाता है
पल भरनी की जग में
यहाँ हर कोई पाता है
श्रेष्ठ कर्मों का फल मीठा
जिसने चाहा पाया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
ईश्वर की अजब माया
कहीं धूप कहीं छाया
न स्वार्थ मिटा मन से
परमार्थ को भूल गया
मानव तन पा कर भी
सिद्धान्त को भूल गया
दो अश्रू दुखी दिल के
क्या पोंछ कभी पाया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
ईश्वर की अजब माया
कहीं धूप कहीं छाया
उठ जाग नींद तज दे
तुझे वेद बुलाते हैं
वैदिक-पथ चल कर ही
सब मुक्ति पाते हैं
साधक है वही जीवन
जो किसी की काम आया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
ईश्वर की अजब माया
कहीं धूप कहीं छाया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
ईश्वर की अजब माया
कहीं धूप कहीं छाया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
हे प्राणी ! फिर इसमें
तेरा मन क्यों भरमाया
राधे राधे राधे जी
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