धर्म के मार्ग पर चलना ही सच्चा धर्म है – जगदगुरु रामानुजाचार्य रामचंद्राचार्य जी।
दुख की घड़ी में होती है धैर्य और विश्वास की परीक्षा।
उझानी, बदायूं 14 अक्टूबर ।
जगदगुरु रामानुजाचार्य रामचंद्राचार्य जी महाराज ने कहा कि ईश्वर कभी धर्म के विरुद्ध चलने की शिक्षा नहीं देते। शास्त्रों के सिद्धांतों का पालन करना ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।
महाराज जी ने कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि और सफलता-असफलता का आना स्वाभाविक है। सनातन धर्म के अनुसार हर परिस्थिति में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सत्य, न्याय और सदाचार के मार्ग पर चलना चाहिए। सुख में अहंकार नहीं करना चाहिए और दुख में धैर्य तथा ईश्वर पर विश्वास नहीं खोना चाहिए।
भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए महाराज जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म, कर्तव्य और धर्म के पालन का संदेश दिया है। गीता के अनुसार मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, फल पर नहीं। इसलिए परिस्थितियों से विचलित हुए बिना कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाला दुख मनुष्य के धैर्य, विवेक और आस्था की परीक्षा है। कठिन समय में ही पता चलता है कि व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर कितना दृढ़ है। विपरीत परिस्थितियों में भी जो अधर्म का सहारा नहीं लेता और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ता, वही वास्तविक अर्थों में धर्म का पालन करता है। धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि आचरण में सत्य, करुणा, ईमानदारी, न्याय और मानवता को अपनाना है।
इस अवसर पर प्रवीण शर्मा,रवि समदर्शी महाराज,जयपाल सिंह, लल्लू सिंह, कमलेश वार्ष्णेय, राहुल शंखधार, गिरीश पाल सिंह, राजीव लोचन, पुरुषोत्तम, मोहित शर्मा, आलोक त्रिवेदी, राजी चौहान, राममोहन शर्मा, गोपाल शर्मा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
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