सुनो,
मत कहना
अंधेरे को अंधेरा
दिख रही जो चीज वो असली नहीं है
जो लगे नकली वो नकली नहीं है
नाचता है बीन सुन अब सपेरा
मौन ऋतुओं की शिरा में सनसनी है
आंख चुंधियाती जहाँ पे रौशनी है
हो रहा है फसल पर हावी लुटेरा
कई हिस्सों में हम सब बंटें हैं
उड़ रहे वनपांखियों के पर कटे हैं।
bdnindia.com bdnindia.com | www.bdnindia.com


