“प्रेम प्रतीक्षा”
घड़ी की सुइयाँ थम सी गई हैं,
राहें भी अब नम सी गई हैं।
पलकों पर सजा है एक इंतज़ार,
जैसे पतझड़ माँगे फिर से बहार।
न कोई आहट, न कोई संदेशा,
मन में बस मिलने का अंदेशा।
समय का पहिया धीरे चलता है,
प्रेम प्रतीक्षा में ही तो पलता है।
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