पुण्य की डुबकी बनी मौत की दहलीज़: कछला घाट पर फिर मचा कोहराम, 18 साल का राजकुमार लहरों में समाया।
करन को मौत के मुँह से खींच लाए गोताखोर, डीएम-एसएसपी की घाट पर परेड, माइक से गूँजी चेतावनी- ‘गहराई माने मौत’।
उझानी-बदांयू 25 मई।
गंगा दशहरा पर मोक्ष की चाह में उमड़ा जनसैलाब कछला घाट पर सोमवार को फिर मातम में बदल गया। आस्था की डुबकी लगाने उतरे दो युवकों को काल की लहरें खींच ले गईं। घाट पर तैनात गोताखोरों ने फौलादी जिगर दिखाते हुए एक को तो बचा लिया, पर दूसरा युवक देखते-ही-देखते गंगा के सीने में दफन हो गया।
जानकारी के अनुसार जलेसर के गढ़ी मानपुर निवासी करन पुत्र रामप्रकाश और बदायूं के सिरसा दबरई गाँव का 18 वर्षीय राजकुमार पुत्र भगवान दास स्नान कर रहे थे। एक लहर आई, पाँव उखड़े और दोनों गहराई के भँवर में समा गए। चीख हवा में घुली, और घाट पर भगदड़ मच गई।
गोताखोरों ने बिना एक पल गँवाए गंगा में छलांग लगाई। मौत से आँख-मिचौली खेलते हुए करन को तो खींच लाए, लेकिन राजकुमार का कहीं नामो-निशान नहीं। घंटों बाद भी गोताखोरों के जाल खाली हैं और माँ की आँखें पथराई हुई हैं।
हादसे की खबर बिजली बनकर जिला मुख्यालय पहुँची। डीएम अवनीश कुमार राय और एसएसपी अंकिता शर्मा का काफिला सायरन बजाता कछला घाट पर आ धमका। अफसरों ने बचाव कार्य की कमान सीधे अपने हाथ में ली।
डीएम का आदेश सख्त था, “एक भी लापरवाही बर्दाश्त नहीं। हर 10 मीटर पर जवान तैनात करो। माइक से हर 5 मिनट पर चेतावनी बजनी चाहिए कि गहराई मतलब मौत।”
गंगा दशहरा पर लाखों की भीड़ को देखते हुए घाट छावनी में तब्दील है। पीएसी, जल पुलिस, एनडीआरएफ और स्थानीय गोताखोर 24×7 तैनात हैं। ड्रोन से निगरानी, नाव से गश्त और कंट्रोल रूम से पल-पल की मॉनिटरिंग।
फिर भी सवाल जस का तस: जब इंतजाम इतने चाक-चौबंद हैं, तो हर पर्व पर गंगा किसी न किसी की बलि क्यों ले लेती है?
हकीकत यह है कि चेतावनी के बोर्ड, माइक की आवाज और खाकी की सख्ती, सब आस्था की जिद के आगे बौने साबित हो रहे हैं। श्रद्धालु ‘पुण्य ज्यादा मिलेगा’ की होड़ में बैरिकेड तोड़कर गहराई में उतर जाते हैं। नतीजा: हर साल कछला घाट पर बिछती हैं लाशें।
गोताखोरों का कहना है कि 24 घंटे बाद शरीर पानी के ऊपर आ जाता है। इसलिए सर्च ऑपरेशन को और तेज कर दिया गया है। उधर राजकुमार के घर चूल्हा नहीं जला। पिता भगवान दास घाट के एक पत्थर पर मूर्ति बने बैठे हैं, टकटकी लगाए।
प्रशासन ने अब अपील की भाषा छोड़ दी है। साफ कहा है: “निर्धारित घाट छोड़कर नहाए तो कार्रवाई होगी। जान आपकी, जिम्मेदारी भी आपकी।”
कछला घाट पर स्नान है या अग्निपरीक्षा? जवाब प्रशासन दे या श्रद्धालु खुद तय करें। फिलहाल गंगा शांत है, पर उसकी गोद में एक और घर का चिराग बुझने की कगार पर है।
— राजेश वार्ष्णेय एमके।




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