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भारत का वो एक गीत…जिसने उड़ा दी थी अंग्रेजों की नींद

भारत का वो एक गाना…जिसने उड़ा दी थी अंग्रेजों की नींद, आज हम सब गाते हैं #वंदेमातरम की कहानी
वंदे मातरम गीत की कहानी रोचक है। यह कोई साधारण नहीं है। वंदे मातरम को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़कर देखा जाता है। अब इसे 150 साल पूरे हो गए हैं। आइए जानें कैसे यह गीत जन-जागरण का प्रतीक बना।
वंदे मातरम सिर्फ एक गाना नहीं है बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा है। इस वर्ष 7 नवंबर 2025 को भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। यह एक ऐसी रचना है जिसने स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र निर्माताओं की अनगिनत पीढ़ियों को प्रेरित किया है। यह भारत की राष्ट्रीय पहचान और का स्थायी प्रतीक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह गीत कब रचा गया? कैसे इसने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी? और कैसे यह स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बना था। आइए यहां वंदे मातरम के इतिहास के उन पन्नों को देखें जो आज तक हमारे दिल में हैं।
7 नवंबर को बंगदर्शन पत्रिका में हुआ था प्रकाशित
7 नवंबर को बंगदर्शन पत्रिका में हुआ था प्रकाशित
PIB के मुताबिक, वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा की गई थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित हुआ था। बाद में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे अपने अमर उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया जो 1882 में प्रकाशित हुआ था।
वंदे मातरम का इतिहास क्या है?
वंदे मातरम का इतिहास क्या है?
वंदे मातरम के महत्व को समझने के लिए इसका इतिहास समझना जरूरी है। इस गीत की पुष्टि अरविंद द्वारा 16 अप्रैल 1907 को अंग्रेजी दैनिक बंदे मातरम में लिखे गए एक अंश से होती है, जिसमें लिखा है कि बंकिम ने अपने प्रसिद्ध गीत की रचना 32 साल पहले की थी। पुस्तक के रूप में इसके प्रकाशन से पहले, आनंद मठ बंगाली मासिक पत्रिका बंगदर्शन में धारावाहिक रूप से प्रकाशित होता था, जिसके संस्थापक संपादक बंकिम थे। 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने बर्लिन के स्टटगार्ट में भारत के बाहर पहली बार तिरंगा झंडा फहराया। झंडे पर वंदे मातरम लिखा था।
वंदे मातरम्- आजादी की आवाज
वंदे मातरम्- आजादी की आवाज
1905 में कोलकाता में बंदे मातरम संप्रदाय की स्थापना हुई, जो मातृभूमि को पूजा के रूप में मानता था। लोग हर रविवार वंदे मातरम् गाते हुए प्रभात फेरी निकालते। रवींद्रनाथ टैगोर भी इसमें शामिल होते। 1906 में बिपिन चंद्र पाल और अरविंदो के संपादन में बंदे मातरम् अखबार शुरू हुआ, जिसने देश में आत्मनिर्भरता, एकता और स्वतंत्रता की भावना जगाई।
स्कूलों में गाने पर भी लगी थी रोक, लेकिन नहीं रुकी गूंज
स्कूलों में गाने पर भी लगी थी रोक, लेकिन नहीं रुकी गूंज
वंदे मातरम् ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय एकता पहचान बन गया। सरकार ने स्कूलों में इसे गाने पर रोक लगाई और छात्रों को दंड भी दिया पर गीत की गूंज नहीं रुकी। यह स्वदेशी आंदोलन से पूरे देश में फैल गया। इससे अंग्रेजों की नींद उड़ गई थी क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत क्रांतिकारियों की शक्ति और उत्साह का प्रतीक बन गया।
14 जनवरी 1950 को क्या हुआ था?
14 जनवरी 1950 को क्या हुआ था?
भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण वंदे मातरम को ‘राष्ट्रगान जन गण मन’ के समान दर्जा दिया जाना चाहिए और समान रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए। आज भी वंदे मातरम देश के प्रति गर्व, प्रेम और समर्पण की याद दिलाता है। यह गीत आज भी हर भारतीय के दिल में उत्साह और देशभक्ति की प्रेरणा देता है जिसे हम गाते हैं
इस गीत के सम्मान में लगभग 50 वर्ष पूर्व आदरणीय पापा राष्ट्रीय गीतकार #डॉउर्मिलेश द्वारा लिखित प्रसिद्ध कविता #गाएंगेगाएंगेहमवंदेमातरम की याद भी आज ताजा हो गई है, आइए आप भी इस कविता को सुन गर्व अनुभव करें

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