बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
जनपद में खाद की किल्लत किसी से छिपी है, कृषि विभाग कस दावा है कि जिले में खाद प्रयाप्त मात्रा है लेकिन इस बात पर चुप्पी साधे हुए हैं कि समितियों पर किसान को क्यों नहीं मिल पा रही। समितियों पर दिन और रात लाइन लगाने वाले किसान देखते रह जाते हैं खाद कब आई और कहां गई इसका पता नहीं चलता। असलियत तो यह है कि जिले में मांग के अनुरूप खाद नहीं है अथवा आवंटन प्रक्रिया में कहीं खोट है। किसान के सामने असलियत कहने में इस लिए डरते हैं क्योंकि कुर्सी पर बैठे हैं। अधिकारियों को खाद की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात तो कहते हैं लेकिन कार्रवाई की नौबत कयों आई इसको कोई नहीं देखता। खाद बिक्रेताओं की अपनी मजबूरी है क्योंकि उनको खाद के साथ अल्ल, बल्ल और सल्ल खाद आपूर्ति करने वालों से लेना पडता है और उसकी कोई मांग नहीं होती वह अल्ल, बल्ल और सल्ल बिक्रेता के हिस्से में आता है और अल्ल, बल्ल, सल्ल की कीमत खाद की कीमत में बढाकर बेची जाती है और इसी के चलते कालाबाजारी का दरवाजा खुल जाता है। कृर्षि विभाग की वह कार्यप्रणाली किसी से छिपी है जो कभी दुकानदारों से अवैध वसूली और कभी नमूने के डर के साथ लाईसेंस निलम्बन, दुकान सील करने और जेल भेजने की कहानी लेकर आम आदमी के बीच हर बार एक नई कहानी लेकर आती है। सत्ता मिलने के बाद सत्ताधारी दल के नेताओं के चहेतों को विभागीय अधिकारी किस रास्ते से दिलवाते ह ैवह किसी से छिपा नहीं है। विपक्ष वाले शोर मचायेगें, किसान संगठन सडकों पर आएगे और फिर आश्वासन की घुटटी और दो बोरी खाद की पर्ची लेकर चुप हो जाएगें जबकि इस सारे मामले में उस किसान को कोई नहीं पूछेगा जिसको खाद की जरूरत है। कितने किसान संगठनों के नेता ऐसे दिखते हैं जिनके पास भूमि तो क्या अपना मकान नहीं है और वह आसरा आवास की योजना का लाभ ले रहे है जबकि ऐसे ही लोग किसान संगठनों के मंच पर ज्यादा हल्ला, ज्यादा शोर करते नजर आते हैं और वह स्थति हमारे किसान, खाद बिक्रेताओं और विभागीय अधिकारियों को सिरदर्द बनी नजर आ रही है।
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