बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
आजादी के बाद से कांग्रेस की सरकारों ने बदायूं को दिल्ली और लखनउ से ना जाने क्यों दूर रखा जबकि बदायूं के मतदाताओं ने हमेशा कांग्रेस का साथ दिया। बदायूं के अंतिम कांग्रेसी सांसद सलीम इकबाल शेरवानी भी इस मामले में दूरी बनाकर चले, बदायूं से सांसद बनकर कें्रद की सरकार में उद्योग और कपडा मंत्री बने शरद यादव कहते रहे लेकिन करा कुछ नहीं पाए। बदायूं के सांसद स्वामी चिन्मयानंद और डा संघमित्रा मौर्य ट्रेन चलवाने के सपने दिखाते दिखाते बदायूं वालों से दूर हो गए जबकि सपा में शामिल होने के बाद बदायूं के सांसद बने सलीम इकबाल शेरवानी प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की सरकार में आमान परिवर्तन तो करा गए लेकिन ट्रेन चलवाने की राह बनाने में श्री शेरवानी पूरी तरह फेल ही नजर आए। सांसद धर्मेंद्र यादव ने बदायूं में बहुत से काम कराये लोकप्रियता भी हासिल की लेकिन ट्रेन चलवाने का काम उनसे भी नहीं कराया जा सका। वर्तमान में सांसद आदित्य यादव हैं जो संसद में ट्रेन चलवाने की बात जोर से उठा रहे हैं लेकिन उनकी आवाज पर सत्ता का जैमर लगा हुआ है। इसको बदायूं की राजनेतिक पकड कहेगें कि वर्तमान केंद्र सरकार मे ंबीएल वर्मा केंद्रीय म्रंत्री हैं लेकिन रेल चलवाने में तमाम काशिश के बावजूद श्री वर्मा को ट्रेन चलवाने में कामयाबी ना मिलना किसी की समझ में नहीं आ रहा है। पिछले दिनों बरेली से मुम्बई तक चालू होने वाली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को चंदौसी के स्थान पर बदायूं होकर चलने की सुगबुहाहट पूरी तरह खामोशी में खोती नजर आ रही है। पता नहीं बदायूं वालों का दिल्ली और लखनउ की दूरी कब कम होगी।
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