भूखे को भोजन नहीं, भरे को भंडार है।
प्यासे को पानी नहीं, तृप्त मधुशाला के द्वार है।
दुनिया के अंदर बाहर, लगा अजूबा हर बार है।
मैं हर बार समझ कर भी नासमझ हो जाता हूं ।
गिन गिन कर थक जाता हूं इसके रंग हजार है ।
पाप पुण्य का लेखा-जोखा लगता है अब उलट गया ।
सत्य जलालत में जीता, झूठे को स्वर्णिम हार है।
प्यासे को पानी नहीं, तृप्त मधुशाला के द्वार है।
प्रियंका विवेक सिंह
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