बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
ऐसा नहीं कि बदायूं से सांसद चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों ने बदायूं में काम नहीं किया परंतु यह भी पूरी तरह सच है कि बदायूं से सांसद बनने के बाद प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार में बदायूं के सांसद को केन्द्रीय मंत्री बनने का गौरव दिलाने वाले तत्कालीन सांसद शरद यादव और बदायूं के सांसद के रूप में सबसे लम्बी राजनेतिक जीवन व्यतीत करने वाले केंद्रीय मंत्री सलीम इकबाल शरवानी तथा बदायूं के सांसद रहे स्वामी चिन्मयानन्द मतदाताओं की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाये। श्री शरद और श्री श्री शेरवानी के समय में उदघाटन तो कई हुए और उनके शिलान्यास समारोह में लाखों रूपये व्यतीत कराये गए लेकिन परिणाम शिलान्यास से आगे नहीं बढा यह भी सच नजर आता है और इसी के चलते बदायूं में अपने कुछ सांसदो पर बाहरी व्यक्ति होने का तमगा हमेशा लगता रहा लेकिन इसी बीच समाजवादी पार्टी ने सलीम इकबाल शेरवानी की जगह धर्मेंद्र यादव को बदायूं संसदीय सीट पर उम्मीदवार बनाया जिन्होने बदायूं का संासद बनने के उपरांत मतदाताओं को इस बात का भी अहसास कराया कि क्षेत्र केि विकास में सांसद की भूमिका क्या होती है। सासंद धर्मेंद्र के प्रयासों से बदायूं में ओवरब्रिज बना, मेडीकल कालिज की स्थापना हुई और बाईपास का निर्माण आज भी धमे।्रद यादव की पहचान बनंे हुए हैं और धर्मेंद्र के प्रयासों से बनी ग्रामीण अंचल की सडकें, गांव – गांव में बिजली तथा सैकडों प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय एवं तमाम इंटर कालिज एवं दर्जनों डिग्री कालिज जनपद में धर्मंद्र यादव के विकास की पहचान बन गए। आज धर्मेंद्र यादव बदायूं के नहीं आजमगढ के सांसद हैं लेकिन बदायूं से तमाम अपनों के राजनेतिक विरोध के प्रयासों के बावजूद बदायूं धमेंद्र और बदायूं वालों के बीच दूरी नहीं बना पा रहें हैं।
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