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गुरुवायुर मंदिर, केरल- Jaya Kishori ji

Jaya Kishori

गुरुवायुर मंदिर, केरल

गुरुवायुर मंदिर की पवित्रता उसके मुख्य विग्रह की पौराणिक उत्पत्ति से गहराई से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि इस मंदिर के आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह की रचना स्वयं भगवान विष्णु ने वैकुंठ में की थी। इसी कारण गुरुवायुर को “भूलोक वैकुंठ” अर्थात पृथ्वी का वैकुंठ भी कहा जाता है।

कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस दिव्य विग्रह को ब्रह्मा को सौंपा। ब्रह्मा ने इसे राजा सुतप और उनकी पत्नी पृश्नि को प्रदान किया। दोनों ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति से भगवान की आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे लगातार तीन जन्मों तक इसी विग्रह की पूजा करेंगे। द्वापर युग में भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया।

भगवान श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण और द्वारका नगरी के समुद्र में समा जाने के बाद, उनके शिष्य उद्धव ने इस दिव्य विग्रह को सुरक्षित रखा। उद्धव ने इसे देवताओं के गुरु बृहस्पति (गुरु) और वायु देव को सौंप दिया। दोनों ने भगवान शिव द्वारा बताए गए सबसे पवित्र स्थान पर इस विग्रह की स्थापना की।

इसी कारण इस स्थान का नाम गुरुवायुर पड़ा—
गुरु + वायु + ऊर (स्थान)।

मान्यता है कि भगवान शिव बाद में समीप स्थित मम्मियूर मंदिर चले गए और वहां से भी गुरुवायुर मंदिर पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखते हैं।

आरोग्य और चमत्कारों से जुड़ी मान्यता

गुरुवायुर मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि चमत्कारी उपचार और आध्यात्मिक शांति के लिए भी प्रसिद्ध माना जाता है। इसके पीछे राजा जनमेजय से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है।

कहा जाता है कि राजा जनमेजय कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए थे। उन्होंने ऋषि अत्रि से मार्गदर्शन मांगा। ऋषि ने उन्हें गुरुवायुर में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करने की सलाह दी। राजा ने एक वर्ष तक पूरी श्रद्धा और निष्ठा से भगवान की पूजा की। मान्यता के अनुसार उनकी बीमारी पूरी तरह ठीक हो गई।

इसी कथा के कारण गुरुवायुर को आज भी शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक कल्याण का पवित्र केंद्र माना जाता है।

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